मध्य प्रदेश में लोकायुक्त और आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (ईओडब्ल्यू) द्वारा हाल ही में की गई कार्रवाइयों से सरकारी महकमों में पद के दुरुपयोग और अनुपातहीन संपत्ति अर्जित करने के चार प्रमुख संगठित तरीके सामने आए हैं।
डमी फर्में, कागजी दवा सप्लाई और टैक्स में हेराफेरी से बनाई अकूत संपत्ति
जांच विवरणों के अनुसार, तकनीकी विभागों में परिजनों के नाम डमी कंपनियां बनाकर पसंदीदा फर्मों को ठेके और वर्क ऑर्डर दिलाए गए। स्वास्थ्य महकमे में स्थानीय स्तर की आपातकालीन खरीद का अनुचित लाभ उठाकर कागजों पर दवाओं की आपूर्ति दर्ज की गई।
इसी तरह नगरीय निकाय स्तर पर निर्मित बहुमंजिला इमारतों को खाली प्लॉट दिखाकर संपत्तिकर में भारी हेराफेरी की गई, जबकि महिला एवं बाल विकास विभाग में पोषण आहार व आंगनवाड़ी मरम्मत बजट में वित्तीय अनियमिताएं उजागर हुईं। इन कार्रवाइयों में आरोपियों के पास वैध आय से 100 से 470 प्रतिशत तक अधिक अनुपातहीन संपत्तियां पाई गईं।
1063 आपराधिक मामलों में केवल सात में दोषसिद्धि, निगरानी तंत्र पर सवाल
विधानसभा में प्रस्तुत आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 से अब तक लोकायुक्त में 1,063 आपराधिक मामले दर्ज किए गए और 1,379 अधिकारी जांच के दायरे में आए। हालांकि, अब तक मात्र सात मामलों में ही दोषसिद्धि हो सकी है, जिससे कनविक्शन रेट मात्र 0.65 प्रतिशत रहा।
प्रशासनिक सुधार विशेषज्ञों का मानना है कि विभागीय स्तर पर समयबद्ध अभियोजन स्वीकृति और त्वरित अदालती सुनवाई के बिना भ्रष्टाचार निरोधक तंत्र का वास्तविक प्रभाव सुनिश्चित करना कठिन है।

